दुनिया के सबसे तेज सुपरकम्प्यूटर्स में अमेरिका का 42% हिस्सा है, भारत का सिर्फ 2%


गैजेट डेस्क. सुपरकम्प्यूटर का नाम सुनते ही दिमाग में एक बड़े से कमरे में तारों के जाल के बीच ढेर सारे बड़े-बड़े कैबिनेट्स की छवि बनती है। नाम से ही जाहिर हो जाता है कि सुपरकम्प्यूटर्स कम्प्यूटर की दुनिया के ‘सुपरहीरोज’ हैं। इसलिए तमाम देशों में सुपरकम्प्यूटर्स बनाने की होड़ लगी हुई है। विज्ञान और तकनीक की दृष्टि से ये महत्वपूर्ण माने जाते हैं। भारत में भी करीब 12 विश्वस्तरीय सुपरकम्प्यूटर्स हैं। इनका इस्तेमाल गाड़ियां डिजाइन करने से लेकर मौसम के अनुमान और नई दवाओं की खोज तक में हो रहा है। तमाम विकसित और विकासशील देश खुद को तकनीकी रूप से मजबूत साबित करने के लिए सुपरकम्प्यूटर्स पर पानी की तरह पैसा बहाते हैं। टॉप 500 प्रोजेक्ट संस्था हर दो वर्ष में सुपरकम्प्यूटिंग से जुड़े आंकड़े जारी करती है। इसके मुताबिक दुनिया में सबसे ज्यादा सुपरकम्प्यूटर्स अमेरिका के पास हैं। दुनिया के सबसे तेज सुपरकम्प्यूटर्स में अमेरिका का 42 फीसदी हिस्सा है। भारत का इसमें दो फीसदी हिस्सा है। इस मामले में हम रूस और साउथ कोरिया जैसे देशों के तो बराबर हैं, लेकिन चीन (8 फीसदी) से काफी पीछे हैं।

  1. सुपरकम्प्यूटर्स किसी देश के लिए तकनीक के क्षेत्र में महज शक्तिप्रदर्शन नहीं है। इनका देश की प्रगति से सीधा संबंध है। जहां भी बड़े पैमाने पर तेज कैलकुलेशन की बात आती है, वहां सुपरकम्प्यूटर्स ही इस्तेमाल होते हैं।

    • मौसम विज्ञान: मौसम व प्राकृतिक आपदाओं के पूर्वानुमान में सुपरकम्प्यूटर्स का काफी महत्व है क्योंकि इसमें ढेर सारी कैलकुलेशन्स करनी होती है।
    • चिकित्सा क्षेत्र: चिकित्सा के क्षेत्र में इसका उपयोग विभिन्न रोगों से संबंधित रिसर्च में होता है। उदाहरण के लिए स्वाइनफ्लू की मॉडलिंग में इसे यूज किया गया।
    • इंडस्ट्रीज में: सुपरकम्प्यूटर्स ने तेल व गैस के नए स्रोतों को खोजने में मदद की है। इसके अलावा प्रोडक्ट डिजाइनिंग व मशीन्स के मॉडल तैयार करने में भी मदद मिली है।
    • सुरक्षा में: न्यूक्लियर टेस्टिंग, मिसाइल लॉन्चिंग आदि के ढेर सारे डेटा को कम समय में प्रोसेस करने में सुपरकम्प्यूटर्स ही वैज्ञानिकों की मदद करते हैं।
  2. दुनिया के सबसे शक्तिशाली 500 सुपरकम्प्यूटर्स की लिस्ट में भारत के 11 कम्प्यूटर हैं। अच्छी बात यह है कि हमारे दो नए कम्प्यूटर सूची में शामिल हुए हैं। इन 11 में से दो ही टॉप 100 में हैं। वहीं अमेरिका की कम्प्यूटरों की संख्या 233 है। यानी सिर्फ रैंक ही नहीं संख्या के मामले में भी भारत फिलहाल पीछे है। भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स दुनियाभर की संस्थाओं में काम कर रहे हैं लेकिन खुद भारत यहां तकनीकी रूप से पीछे नजर आ रहा है। इसके पीछे अक्सर बजट की कमी को कारण माना जाता है। हालांकि इस कमी को दूर करने के लिए ही भारत सरकार ने मार्च में नेशनल सुपरकम्प्यूटिंग मिशन की शुरुआत की है। इसके तहत देशभर में सात वर्षों में 73 नए सुपरकम्प्यूटर्स बनाने की योजना है।

    • 4500 करोड़ रुपए बजट दिया गया है भारत के ‘नेशनल सुपर कम्प्यूटिंग मिशन’ का
    • 600 करोड़ रुपए बिजली का बिल आएगा हर साल अमेरिका के प्रस्तावित सबसे तेज सुपर कम्प्यूटर को चलाने पर
    • 33860 ट्रिलियन कैलकुलेशन प्रति सेकेंड कर सकता है चीन का ताइन्हे-2
  3. कम्प्यूटर की सामान्य परिभाषा के मुताबिक हम उसे कोई डेटा देते हैं और वह उसे प्रोसेस कर आउटपुट या नतीजा देता है। उदाहरण के लिए हम गुणा-भाग के लिए उसे कोई संख्याएं देते हैं और वह उसका नतीजा हमें दे देता है। आम कम्प्यूटर में हम एक बार में इस तरह की एक ही प्रोसेस कर सकते हैं, वहीं सुपरकम्प्यूटर बेहद कठिन हजारों-करोड़ों कैलकुलेशन को एक ही समय में एक साथ प्रोसेस कर सकता है। दरअसल इसमें एक साथ हजारों प्रोसेसर काम करते हैं। इसलिए ये काफी बड़े होते हैं। सुपरकम्प्यूटर बनाने के प्रयास वर्ष 1960 में शुरू हुए थे।

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