टुकड़े टुकड़े गैंग का डर: ये देश कहीं टुकड़े-टुकड़े ना हो जाए; कन्हैया का जीतना मुश्किल


नई दिल्ली.आधुनिक भारत का तक्षशिला और नालंदा कहा जाने वाले जवाहर नेहरू विश्वविद्यालय के विशाल गेट को पार कर एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लाॅक के कुछ आगे बढ़ने पर दाईं ओर रुख करिए तो एक ऊबड़-खाबड़ घाटी दिखाई देती है। बस, यहीं कीकर के पेड़ों की अधमरी छांव में कंक्रीट के चौकोर बोल्डरों पर बैठकर जेएनयू के स्टूडेंट्स ‘थॉट विद फूड्स और फूड फॉर थॉट्स’ में कंफ्यूज रहते हैं। शाम को भी गंगा ढाबे पर वही चिरपरिचित मंजर था। समोसों, नूडल्स और सैंडविच के साथ शोधार्थियों ने छोटी-छोटी चौपाल जमा रखी थीं।

शाम का झुरमुटा, अप्रैल की गर्मी और सिर पर बवंडर की तरह घूमते मच्छरों के झुंड पेड़ की डाली तक जाते हैं। किसी गिटारिस्ट की तरह लम्बे बालों और चेहरे पर मोटे काले फ्रेम के चश्मे से झांकते हुए एक एमफिल का स्टूडेंट दोस्तों से कहता है- ये फर्जी मैसक्यूलिन राष्ट्रवाद नवयुवकों को खतरनाक रास्ते पर ले जा रहा है। यह अनकल्चर्ड जोश की जमीन ही बीजेपी के लिए जोरदार फर्टाइल लैंड है। वहां कमल फलफूल रहा है। इस झबरीले बालों वाले इंटलैक्चुअल से, उसके 3 दोस्त भी सहमत दिखते हैं।

‘यही नवयुवक शर्ट के दो बटन खोलकर राष्ट्रवाद का झंडा लेकर खड़ा है’

हार के कटिहार से जेएनयू तक का सफर नापकर आया सुप्रियो बहस में तड़का लगाता है। बोला- पता है पिछली बार गांव गया तो वहां नजारा बदल गया था। मेरा भांजा 18 का है। कटिहार में पहली बार दंगे हुए तो वह भी उसमें शामिल था। वजह यह थी कि उसकी स्कूटी को आग में झाेंक दिया गया था। इस बार मैं गांव गया तो देखा कि यही नवयुवक शर्ट के दो बटन खोलकर राष्ट्रवाद का झंडा लेकर खड़ा है।

छात्र का भास्कर से सवाल

मैंने पूछा- मैं आपकी इस चर्चा में शामिल हो सकता हूं। मेरे इस विनम्र आग्रह को उस मंडली ने तुरंत स्वीकार कर लिया। लेकिन जवाबी सवाल बेहद टेढ़ा था- भास्कर किस पार्टी के लिए लिख रहा है? बरेली से आए चंद्रप्रकाश ने एकदम सहज भाव से पूछा। जवाब का उन्होंने इंतजार नहीं किया। उनका बोलना जस का तस जारी रहा- मीडिया तो ऐसा नेरेटिव पेश कर रहा है कि यह देश सिर्फ एक शख्स चलाता है।

  1. जीत हार की बात नहीं है। डेंजर इससे आगे का है। अर्बन सीन बदल रहा है। एग्रेरियन क्राइसिस यह है कि नया युवा पढ़ा-लिखा होने के घमंड में खेती करने को जहालत और अशिक्षित लोगों का काम समझ बैठा है। उसे स्किल इंडिया का झुनझुना थमाया जा रहा है। एक सवाल होता था हमारी पीढ़ी में कि भविष्य में क्या करना है। अब इस युवा को रोजगार की जल्दी पड़ी है। उसे मिस्त्री बनाया जा रहा है। वह फास्ट फूड रेस्त्राओं में जाकर प्लेटें उठाने को तैयार है। उसकी मानसिक भूख पाकिस्तान को गाली देकर और राष्ट्रवाद के डोले फुलाकर पूरी हो जाती है।

  2. बीजेपी नहीं तो कांग्रेस जीतेगी। पर हल क्या? उनके ‘न्याय’ में तो बख्शीश शाामिल है। 72 हजार रुपए सालाना की खैरात है। रोजगार पैदा करने के वादे हैं लेकिन उसे पैदा करने के उपाय नहीं है। नए युवा को बरगलाने के इक्यूपमेंट दोनों पार्टियों के पास रटे-रटाए हैं।और दिल्ली में कांग्रेस आप का गठबंधन हो जाएगा क्या? इतना लोकल होकर कभी सोचा ही नहीं। झबरीले बालों वाले ने दो टूक कहा। बाकी ने मौन रहकर सहमति दी।

  3. टुकड़ा टुकड़ा गैंग से ये बात पूछ रहे हैं आप? तो सुन लो। हमें इस बात की चिंता है कि देश की सोच टुकड़ा टुकड़ा ना हो जाए। पर सच्चाई यही है कि एक पावरफुल आइडिया बहुत कामयाबी से बेचा जा रहा है। जिसमें जमीन के मुद्दे मायने नहीं रखते। जहां ऐसी बातें मायने रखती हैं जिन्हें जमीनी हकीकत की सच्चाई पर तौला नहीं जा सकता। (पियाली ने सिगरेट के गहरे कश का धुआंं सिर पर मंडरा रहे मच्छरों के बवंडर को भेदते हुए कहा) पियाली का सब्जेक्ट सोशल साइंस है। उसका कहना है कि इंजीनियर से लेकर टैक्नोक्रेट तक में बीजेपी का क्रेज बढ़ रहा है। सोशलिस्ट सोच इसका एंटीडोट हुआ करती थी। वह जमीन से गायब हो गई है।

  4. शायद नहीं। मुश्किल है। सबने एक स्वर से माना। क्यों मुश्किल है? क्योंकि वह अपनी जात को बेच नहीं पाएगा। वह भूमिहार है। लेकिन वह यह बात अपने राइवल्स के सामने रख नहीं पाएगा। जिस दिन वह भूमिहार होने को बेचेगा उस दिन तो वह कन्हैया नहीं रह जाएगा।

  5. चाय-समोसे के बिल चुकाने का वक्त हो चला था। काउंटर के साइड में एक पोस्टर पर लिखा है- ‘भगत सिंह अभी जिंदा है’ नाटक का मंचन शाम साढ़े सात बजे। एक और पोस्टर पर दूसरे नाटक का ऐलान है- ‘एक मिनट का मौन’ कामरेड चंद्रशेखर आजाद की याद में।

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