मसूद अजहर प्रकरण से भारत-अमेरिका को सबक



भारत के संयुक्त राष्ट्र में पहुंचने के एक दशक बाद जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 मंजूरी समिति ने इस माह वैश्विक आतंकी घोषित किया। आतंकवाद से लड़ने की बात हो तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को न मानने के पाकिस्तान के इतिहास को देखते हुए लगता नहीं कि मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने से तब तक कोई फर्क पड़ेगा जब तक वह पाकिस्तान में ही बना रहे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते दबाव को देखते हुए तानाशाही फौज से प्रभावित पाकिस्तान की सरकार ज्यादा से ज्यादा यह कर सकती है कि वह मसूद अजहर को अस्थायी तौर पर सलाखों के पीछे कर दे अथवा नज़रबंद कर दे और अंतरराष्ट्रीय दबाव घटते ही उसे फिर रिहा कर दे।

लेकिन मसूद अजहर के लिए वैश्विक आतंकवादी के तमगे का इससे जुड़े चारों प्रमुख पक्षों यानी भारत, पाकिस्तान, अमेरिका और चीन के लिए अपना महत्व है। इसके साथ पाकिस्तान में काफी गहराई तक भारत द्वारा किए साहसी हवाई हमले ने मसूद अजहर जैसे शीर्ष आतंकी सरगना को कड़ा संदेश दिया है, जो उस देश में सुरक्षित रह रहा है और भारत व अफगानिस्तान के खिलाफ आतंकी हमलों की साजिश रचने में लगा रहता है। अब उसकी सुरक्षित पनाहगाह उसके लिए इतनी सुरक्षित नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण नतीजा तो अमेरिका के लिए हैं, जो एक दशक से भी ज्यादा समय से दक्षिण चीन सागर अथवा हिंद महासागर में चीन के आक्रामक रवैये का उत्तरोत्तर मूक दर्शक बनता जा रहा था। इतना ही नहीं वह चीन द्वारा बौद्धिक चोरी और अमेरिकी कंपनियों को धमकाने के खिलाफ कोई कार्रवाई करने में खुद को नाकाबिल पा रहा था। एक ऐसे समय जब अमेरिका चीन के साथ व्यापार को लेकर कड़ी सौदेबाजी में लगा है तो मसूद अजहर के मामले ने ट्रम्प प्रशासन को यह साहस दिया है कि वैश्विक खिलाड़ियों को साथ लेकर आक्रामक व अच्छी तरह अमल में लाई योजना के बल पर अमेरिका चीन से वह हासिल कर सकता है, जो उसे चाहिए। यह शायद एक दशक में पहली बार है कि अमेरिका ने किसी खास मुद्दे पर चीन के साथ कड़ाई बरतने का फैसला किया है।

इसे एक टेस्ट केस की तरह लेते हुए ट्रम्प प्रशासन ने चीन को साफ कर दिया था कि अब बहुत हो गया और इस बार उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने देना होगा। इसमें फ्रांस और ब्रिटेन ने अमेरिका का साथ दिया। अमेरिका ने इस मुद्दे पर चीन को कड़ी समय-सीमा दी थी और उसे धमकी दी थी कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में उसके पाखंडी व्यवहार का भंडाफोड़ कर देगा। व्हाइट हाउस ने ऐसी सख्ती दिखाई कि बीजिंग मदद के लिए नई दिल्ली की ओर दौड़ लगाने पर मजबूर हो गया। इसने भारत से कहा कि वह उसे कुछ और समय दे। मोदी सरकार को ट्रम्प प्रशासन को काफी मनाना पड़ा, तब जाकर वह चीन को इस मुद्दे पर कुछ वक्त देने को राजी हुआ।

अन्यथा अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने 27 मार्च की समय-सीमा तय कर दी थी। इन तीन देशों ने चीन से कह दिया था कि या तो वह मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने के खिलाफ अपनी आपत्ति वापस ले या वे प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले जाएंगे। इसका नतीजा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में खुली बहस में होता, जिसमें चीन कैमरे के सामने वैश्विक आतंकी का बचाव करने पर मजबूर हो जाता। चीन यह नहीं चाहता था।

भारत के अनुरोध पर ही अमेरिका चीन को कुछ वक्त देने पर राजी हुआ। भारत का पसंदीदा विकल्प आमसहमति का था और नई दिल्ली ने यही ट्रम्प प्रशासन को बता दिया था। इस पूरे मामले में नई दिल्ली और वाशिंगटन डीसी के बीच मजबूत तालमेल रहा। यह भारत-अमेरिका रिश्तों के प्रगाढ़ होने का संकेत है। ट्रम्प प्रशासन के लिए मसूद अजहर के पूरे मामले से यह साफ हो गया कि सख्ती बरतने पर चीन झुक जाता है। हो सकता है कि यही रणनीति ट्रम्प प्रशासन चीन के खिलाफ आने वाले महीनों व वर्षों में आजमाता नज़र आए।

भारत को इस प्रकरण से यह प्रमुख सबक मिला कि यदि आप खुद की मदद करेंगे तो दुनिया आपके साथ होगी। यदि भारत ने पाकिस्तान के भीतर आतंकी शिविरों पर हमला करके बड़ी संख्या में आतंकियों को मारने का फैसला नहीं किया होता, तो प्रमुख वैश्विक शक्तियों ने वह फुर्ती नहीं दिखाई होती, जो उन्होंने इस बार दिखाई। भारत के हवाई हमलों और उसके बाद फरवरी के अंतिम हफ्ते में दक्षिण एशिया में तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय समुदाय तेजी से पाकिस्तान के भीतर से काम कर रहे आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने पर मजबूर हुआ अन्यथा दोनों पड़ोसी देशों के बीच युद्ध का आसन्न खतरा था। उन्हें लगा कि मसूद अजहर का मसला ऐसा है, जिससे क्षेत्र में तनाव घटाने में मदद मिल सकती है।

पाकिस्तान के लिए प्रमुख संदेश यह रहा कि अब वह चीन की मदद को मानकर नहीं चल सकता। यदि चारों तरफ से मजबूर किया जाए तो चीन अब उसके बचाव में नहीं आएगा। इसे पाकिस्तानियों के इस दृष्टिकोण में पहले धक्के की तरह देखा जा सकता है कि चीन उसका हर मौसम का साथी है और चीन एकमात्र ऐसा दोस्त है, जो आतंकियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के साधन के रूप में इस्तेमाल करने की उसकी नीति का समर्थक है। अब इस नीति के बचाव में उसके आने की गारंटी नहीं रही। इस तरह संयुक्त राष्ट्र द्वारा मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करना न सिर्फ आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मील का पत्थर है बल्कि इसने भारत, पाकिस्तान, चीन और अमेरिका को भी महत्वपूर्ण सबक सिखाए हैं। इसका उनकी भावी कार्रवाइयों व नीतियों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।

ललित झा

चीफ यूएस कॉरेस्पॉन्डेंट, पीटीआई Twitter : @lalitkjha

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