यूएन के प्रस्ताव में पुलवामा हमले का जिक्र नहीं, लेकिन पाक पर ब्लैक लिस्टेड होने का खतरा


1 मईको संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की 1267 सेंक्शंस कमेटी ने जैश-ए-मोहम्मद के सरगना अजहर मसूद को ग्लोबल आतंकी घोषित कर दिया। मसूद जैसे आतंकियों को पालने वाला पाकिस्तान इसमें भी खुशी दिखा रहा है। वह इसे कूटनीतिक जीत बता रहा है, क्योंकि यूएन डिक्लरेशन में मसूद के पुलवामा हमले का जिक्र नहीं है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के मामलों में पाकिस्तान को ब्लैक लिस्टेड भी किया जा सकता है।

इधर प्रश्न उठने लगे हैं कि आतंकी घोषित करने के कारणों में पुलवामा का उल्लेख क्यों नहीं है? ये प्रश्न इसलिए भी उठा, क्योंकि पुलवामा हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ही ली थी। खास बात यह भी है कि 2009 से अब तक भारत के प्रयासों पर चार बार वीटो करने वाले चीन ने भी यूएन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। यूएन नेे जैश-ए-मोहम्मद को 2001 में ही आतंकी संगठन मान लिया था, जबकि उसके सरगना अजहर मसूद को आतंकी मानने में 18 साल का समय लग गया।

ग्लोबल आतंकी घोषित होने से मसूद अब न तो खुलेआम घूम सकता है और न ही रैली कर सकता है। उसकी संपत्ति और वित्तीय संसाधन फ्रीज होंगे। वह यूएन के किसी भी सदस्य देश में प्रवेश नहीं कर पाएगा। लेकिन इन प्रतिबंधों की उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि पाकिस्तान के विदेश मंत्री महमूद कुरैशी बीते एक मार्च को कह चुके हैं, ‘‘मसूद बहुत बीमार है और चल फिर नहीं सकता।’’ ऐसे में प्रतिबंध यूं भी बेअसर लगते हैं। दूसरी बात यह कि 2008 में मुंबई हमले के तुरंत बाद यूएन ने लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) के हाफिज सईद को ग्लोबल आतंकी घोषित किया था। अमेरिका ने भी उस पर करीब 70 करोड़ रुपए का इनाम रखा था। इसके बावजूद सईद आज भी खुलेआम घूमता है। खुले आम रैलियां आयोजित कर चंदा जमा करता है। नए आतंकी भी तैयार करता है। पाक चुनाव में अपने प्रत्याशी भी उतारे थे।

इस फैसले से जुड़े 4 देशों की रणनीति

भारत, चीन-अमेरिका दोनों से व्यापार और सुरक्षा में फायदा :जानकार कहते हैं कि पाकिस्तान के नुकसान को अगर भारत अपना लाभ माने तो भारत को फायदा है। अमेरिका और चीन के बीच तनाव बढ़ने से भी भारत दोनों देशों से व्यापार सहित सुरक्षा मसलों पर बेहतर मोल-भाव कर पाएगा। अमेरिका यह भी चाहता है कि भारत के रक्षा बजट का आधिक हिस्सा अमेरिकी कंपनियों के पास आ जाए। अभी भारत रूस पर ज्यादा निर्भर है। इस कदम से भारत अमेरिका के दबाव में आ सकता है और रूस का झुकाव भारत की तुलना में पाकिस्तान की तरफ हो सकता है। इसका कुछ संकेत तब मिला जब रूस मसूद मसले पर चुप रहा, जबकि वह भारत के पक्ष में रहा करता था।

23 मई के बाद कैसी सरकार बनती है, चीन और अमेरिका के बीच इस महीने होने वाली ट्रेड (वार) वार्ता किस करवट बैठती है, इरान का रुख अमेरिका के प्रति क्या रहता है और चीन, रूस पाकिस्तान का कितना सपोर्ट कर पाते हैं ये निर्धारित करेगा कि आगे क्या होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि टकराव का माहौल गहराएगा, आतंकवाद और बढ़ेगा क्योंकि, अगर आईएमएफ के अप्रैल 2019 की रिपोर्ट को मानें तो, विकसित और चीन जैसी अर्थव्यवस्थाएं भी 2019 में धीमी पड़ सकती हैं।

पाकिस्तान, वैश्विक आर्थिक व्यवस्था से बाहर हो सकता है :पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इसी 1 मई को प्रेस रिलीज में कहा -‘मौजूदा प्रस्ताव तभी पारित हुआ है, जब पुलवामा और कश्मीर का उल्लेख प्रस्ताव से हटाया गया। यह प्रस्ताव 10 साल से सेंक्शंस कमेटी के पास था। पहले तकनीकी कारणों से प्रस्ताव रद्द होता रहा, पर अब संशोधित प्रस्ताव मंजूर हो गया है। पाकिस्तान मानता है कि आतंकवाद दुनिया के लिए खतरा है। हम कश्मीरी भाइयों को राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक सहयोग देते रहेंगे।’ इस पर ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के वाइस प्रेसिडेंट गौतम चिकरमने कहते हैं, ‘‘पाकिस्तान को भ्रम है कि पुलवामा और कश्मीर का उल्लेख हट जाने से उसकी भारत पर जीत हो गई। तथ्य यह है कि पाकिस्तान आतंकवाद को पालता है। मसूद का वैश्विक आतंकी घोषित होना इसकी पुष्टि है। पाकिस्तान अपने बिखराव के बहुत करीब पहुंच चुका है।’’

चिकरमने के मुताबिक, अब पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से कर्जा लेने में दिक्कत आएगी। अगर मिलता भी है तो कड़ी शर्तें के साथ ही मिलेगा। इसी साल होने वाली फाइनेन्शियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की बैठक में अब पाकिस्तान को ब्लैक लिस्ट में डाला जा सकता है। अभी वह ग्रे लिस्ट में है। ऐसा होता है तो पाक वैश्विक अर्थव्यवस्था से बाहर हो जाएगा और किसी से आर्थिक लेन-देन नहीं कर पाएगा। पाकिस्तान आर्थिक मामलों में बहुत बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में अगर उस पर प्रतिबंध लगते हैं तो हालत और खराब हो जाएगी।

चीन, यूएन के मंच पर दुनिया के सामने शर्मिन्दगी से बचा :अमेरिका ने चीन से साफ कर दिया था कि या तो होल्ड हटाए या सुरक्षा परिषद के खुले मंच पर मसूद का बचाव करे। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन भी पाकिस्तान की वजह से अपनी गिरती छवि को बचाना चाहता था। खुले मंच पर मसूद का बचाव करने से बचने के लिए चीन को झुकना पड़ा। दूसरी तरफ चीन को भारत के बाजार में जगह बनाने के लिए बात करने का मौका मिल रहा है। चीन भारत के चुनावी माहौल में मसले पर रुकने के पक्ष में था, ताकि मोदी को फायदा न हो जाए।

अमेरिका, चीन पर दबाव बढ़ाने की रणनीति की जीत :नाम नहीं उजागर करने की शर्त पर कूटनीतिक अफसरों का मानना है कि मसूद के बहाने अमेरिका की कोशिश चीन पर दबाव बनाने की है। यहां तक कि पेंटागन इस महीने होने वाले शांग्रीला डायलॉग के दौरान एक नया इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजिक डॉक्यूमेंट ला सकता है, ताकि वह इस क्षेत्र में और ताकत झोंक सके। अजहर मसूद पर प्रतिबंध के लिए लाया गया प्रस्ताव इसका प्रदर्शन है। इससे एक तरफ चीन पर दबाव पड़ेगा, भारत अमेरिका के करीब आएगा और इरान के ऊपर लगे प्रतिबंधों पर भारत चुप भी रहेगा।

मसूद और जैश-ए-मोहम्मद की कहानी

1953 से पड़ गई थी पाक में आतंक की नींव:1953 में कराची के पास बिनोरी में देवबंदी ‘दीनी मदारिस’ ने एक संस्था की स्थापना की जो आज जामिया उलूम उल इस्लामिया के नाम से जाना जाता है। बिनोरी में ही अजहर मसूद ने ट्रेनिंग ली थी। ओसामा बिन लादेन को भी इसी मदरसे ने सहयोग किया था।

जमात-उल-अंसार और: हरकत-उल-जिहादी इस्लामी (हुजी) जैसे आतंकी संगठन बिनाेरी के मदरसे के छात्रों ने बनाए। जमात-उल-अंसार ने ही मसूद को अफगानिस्तान में जिहाद के लिए तैनात किया।

हुजी से टूटकर हरकत उल मुजाहिदीन (हुम) बना, जिसने कश्मीर में आतंक फैलाना शुरू किया। 1993 में मसूद ने हुजी और हुम को एक करके हरकत- उल-अंसार बनाया, जो अल कायदा के साथ काम करता रहा।

1994 में मसूद को भारतीय सेना ने कश्मीर में दबोचा। हरकत-उल-अंसार ने मसूद और उसके साथियों को छुड़ाने के लिए भारत आए टूरिस्टों का अपहरण करना शुरू किया। अमेरिका ने 1997 में इसे आतंकी संगठन घोषित कर दिया।

हरकत-उल-अंसार ने अपना नाम बदलकर हरकत-उल-मुजाहिदीन रख लिया। दिसंबर 1999 में इंडियन एयरलाइंस की आईसी 814 के हाइजैक के बाद मसूद रिहा हो गया और उसने जैश-ए-मोहम्मद बना लिया।

21वीं सदी के कई बड़े हमलों में मसूद का नाम आया

2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला हुआ। 1 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर विधान सभा पर हमला हुआ। फिर इसी साल 13 दिसंबर को भारतीय संसद पर हमला हुआ। इन सारे हमलों में जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तोइबा का हाथ था।

2001 में आतंकी संगठन घोषित होने के बाद जैश ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ पर दो बार जानलेवा हमला किया। पाकिस्तान की सेना, सरकार और आईएसआई से रिश्ते खराब होने का कारण जैश दस साल तक कश्मीर में शांत रहा।

2013 में भारतीय संसद पर हमले का आरोप सिद्ध होने पर अफजल गुरू को फांसी दी गई। मसूद ने अफजल गुरू शहीद स्क्वॉड बनाया, जिसने 2014-2015 के बीच कठुआ, संबा, जम्मू, श्रीनगर और पुलवामा में आतंकी हमले किए।

2016 में जैश ने पठानकोट, नगरोटा और उड़ी में सेना की छावनियों पर हमले किए। 2018 में सुनजुवान में सेना की छावनी पर हमला किया गया और फिर 2019 में पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हमला किया।

प्रस्ताव से घोषणा तक का सफर, मसूद 68 दिन में आतंकी घोषित :पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर 14 फरवरी के हमले के बाद यूएन ने 22 फरवरी को कड़े शब्दों में निंदा की।

  • 27 फरवरी को अमेरिका, इंग्लैंड और फ्रांस ने यूएन के 1267 सेंक्शंस कमेटी में प्रस्ताव दाखिल किया कि मसूद ग्लोबल आतंकी घोषित हो।
  • 13 मार्च को चीन ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए प्रस्ताव पर होल्ड लगा दिया। चीन 2009, 2016 और 2017 में इसी प्रकार होल्ड लगा चुका था।
  • 28 मार्च को अमेरिका ने इंग्लैंड और फ्रांस की मदद से सीधे यूएन की सुरक्षा परिषद में ड्राफ्ट प्रस्तावित कर दिया।
  • 3 अप्रैल को चीन ने अमेरिका का कड़े शब्दों में विरोध किया और कहा कि ऐसी जबरदस्ती से दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता पर विपरीत असर पड़ेगा।
  • 25 से 27 अप्रैल तक हुई बेल्ट और रोड फोरम की मीटिंग में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान चीन गए और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की।
  • 30 अप्रैल को चीन ने बयान दिया कि मसूद के ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करने के प्रस्ताव पर कुछ प्रगति हुई है।
  • 1 मई को, चीन के प्रस्ताव से होल्ड हटा लेने के बाद, यूएन की 1267 सेंक्शंस कमेटी ने अजहर मसूद को ग्लोबल आतंकवादी घोषित कर दिया।

क्या है 1267 सेंक्शंस कमेटी :15 अक्टूबर 1999 को, अफगानिस्तान में तालिबान और आतंकवाद के विरुद्ध, संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव नंबर 1267 पारित किया था। इसमें दोहराया गया था कि विश्व में शांति बहाल करने के लिए आतंकवाद का खात्मा करना अनिवार्य है। इसी प्रस्ताव नंबर 1267 से इस कमेटी को जाना जाता है।

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Pak’s happy not to mention the Pulwama attack in UN resolution, but threat to blacklisted Pak

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