IIT के 3 दोस्तों का स्टार्टअप; किसानों को अब नहीं जलानी पड़ेगी अपने खेतों की पराली, उन्हें इसका मिलेगा रुपया


नई दिल्ली।पंजाब, हरियाणा में पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण हर साल सुर्खियों में आता है। देशभर के किसान हर साल अक्टूबर में पराली जलाते हैं। जोकि धान की फसल कटने बाद बचा बाकी हिस्सा होता है। इसे जलाने से नाइट्रोजन ऑक्साइड, मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड गैसें हवा में फैलती है। जो दमा, ब्रोंकाइटिस के अलावा नर्वस सिस्टम से जुड़ी कई बीमारियों का कारण बनती हैं। नासा अर्थ ऑब्जर्वेटरी के मुताबिक भारत में हर साल करीब 80 लाख टन पराली जलाई जाती है। आईआईटी दिल्ली से बीटेक करने वाले तीन स्टूडेंट्स अंकुर कुमार, कणिका प्रजापत और प्राचीर दत्ता ने पराली की इस समस्या को दूर करने का एक बायो फ्रेंडली तरीका ईजाद किया है। इन तीनों ने ऐसी टेक्नोलॉजी तैयार की है जिसकी मदद से पराली को बायोडिग्रेडेबल कटलरी (कप, प्लेट आदि) में बदला जा सकता है। इनकी टेक्नोलॉजी पराली की ही तरह अन्य एग्रो वेस्ट को कटलरी में बदल सकती है। यह बायोडिग्रेडेबल कटलरी प्लास्टिक से बने कप-प्लेट की जगह ले सकती है।

स्टार्टअप को शुरुआती सहूलियत आईआईटी दिल्ली से मिली है। आईआईटी दिल्ली में फाउंडेशन फॉर इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (एफआईटीटी) नाम की सोसाइटी रजिस्टर्ड है। क्रिया लैब्स के तीनों फाउंडरों ने अपने प्रोजेक्ट पर काम करने के लिए आईआईटी दिल्ली में हुए प्लेसमेंट को भी छोड़ दिया था। इन्हें भारत सरकार की ओर से एक साल की डिजाइन इनोवेशन फैलोशिप और विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के निधि सीड सपोर्ट से फंडिंग मिली। इसकी मदद से इन्होंने अपना प्रोटोटाइप तैयार किया।

तीनों यहां पहली प्रोसेसिंग यूनिट लगाएगी

क्रिया लैब्स के सीईओ अंकुर बताते हैं, ‘हमारा लक्ष्य पराली को कॉमर्शियल वैल्यू देना है। जब किसानों को इससे फायदा होगा तो वे इसे जलाएंगे नहीं। इससे ग्रामीण इलाकों में रोजगार का सृजन भी होगा।’ अंकुर, कणिका और प्राचीर ने अपनी टेक्नोलॉजी का पेटेंट भी करा लिया है। क्रिया लैब्स इस साल के अंत में पंजाब के लुधियाना में पहली प्रोसेसिंग यूनिट लगाएगी।

मशीन से पराली को पल्प बनाते हैं

क्रिया लैब्स की चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर कणिका ने बताया, ‘हमने जो मशीन डेवलप की है, उसमें पहले प्राकृतिक केमिकल की मदद से पराली में मौजूद ऑर्गेनिक पॉलीमर को सेल्यूलोज से अलग कर पल्प तैयार किया जाता है। यह पल्प सेमी सॉलिड होता है। इसे सुखाकर नमी खत्म की जाती है और फिर इससे कप, प्लेट, जार आदि बनाए जाते हैं।’

एक यूनिट का खर्च 1.5 करोड़ रुपए

क्रिया लैब्स के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर प्राचीर दत्ता बताते हैं, ‘एक यूनिट को लगाने का खर्च करीब 1.5 करोड़ रुपए है। इससे रोजाना 4 से 5 टन पल्प तैयार किया जा सकता है। यह करीब 800 एकड़ जमीन की पराली को प्रोसेस करने के लिए काफी है।

क्रिया लैब्स का बिजनेस मॉडल…

क्रिया लैब्स पार्टनरशिप के जरिए यूनिट लगाएगी। पराली कलेक्शन का काम बड़े किसानों को दिया जाएगा। ये किसान अपने खेत और छोटे किसानों के खेत से पराली इकट्ठा करेंगे। यूनिट प्रबंधन एक किलो पराली के लिए 3 रुपए का भुगतान करेगा। एक एकड़ जमीन की पराली की कीमत करीब पांच हजार रुपए होगी। इसे खेत से उखाड़ने और यूनिट तक लाने का खर्च प्रति एकड़ करीब दो हजार रुपए पड़ेगा। पराली को पल्प में बदलने के बाद क्रिया लैब्स उसे कप-प्लेट बनाने वाली कंपनियों को बेचेगी।

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Punjab Ludhiana News in Hindi: story of three IIT friends of Startup 

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